What is title art and its types and importance? | शीर्षक कला और इसके प्रकार और महत्व क्या है?

शीर्षक कला (शीर्षक की संरचना) 

मानव शरीर में जो महत्त्वपूर्ण स्थान सिर का हैं वही किसी रचना के में शीर्षक का है। लेख, निबन्ध, कहानी, उपन्यास, समाचार सभी शीर्षक होते हैं। शीर्षक समाचार का प्राण तत्त्व है। कहा तो यह भी जाता है कि समाचार-पत्र नहीं बिकते, उनके शीर्षक बिकते हैं। इसक अभिप्राय है जिस पत्र के समाचार शीर्षक संक्षिप्त, जीवन्त, सारगर्भी और पैने हैं वही पत्रकारिता जगत में स्थान बना पाते हैं। पाठक वर्ग शीर्षक या सुर्खियों पर दृष्टिपात करता है। यदि प्रभावपूर्ण लगी तो पत्र का क्र हो जाता है। स्पष्ट है कि लम्बे, निरर्थक, अटपटे और उत्तेजक शीर्षक से पत्र की प्रसार संख्या कदापि नहीं बढ़ सकती इतना अवश्य है शीर्षक यदि प्रभावात्मक हैं तो प्रसार संख्या में अभिवृद्धि असंदिग्ध है। कतिपय विद्वानों ने शीर्षक कला के बारे में विचार व्यक्त किए हैं- इन्द्र विद्यावाचस्पति के अनुसार, “शीर्षक कला हुनर है।” 

रौलेण्ड बूलसले की मान्यता है, “अखबारों में शीर्षक शीशा लगी खिड़की की तरह है जिनके भीतर सजा कर रखा माल देख दर्शक का मन ललचा जाता है, खरीदने को उत्सुक हो जाता है।” विख्यात पत्रकार सी.वाई. चिन्तामणि तो शीर्षक को सिर दर्द की संज्ञा प्रदान करते हैं (Heading is a headaque) अर्थात् एक उपयुक्त आकर्षक शीर्षक सोचने में पूरा बौद्धिक व्यायाम करना पड़ जाता है। शीर्षक तो स्कर्ट जैसा है जिसमें आवरण, अनावरण का सन्तुलन बनाय रखना जरूरी है। शीर्षक के अन्दर समाचार का पहलू झांके, परन्तु गोपनीय भाग सुरक्षित रहे।” 

डॉ. (श्रीमती) शक्ति बुद्धिराजा की मान्यता है, “समाचार के सारे भाव, उसकी ध्वनि, उसकी महत्ता, उसके तमाम आधार और वातावरण क्षण मात्र में उसी प्रकार प्रकट होते हैं जैसे आकाश से बिजली चमकती है। शीर्षक पूरे समाचार का सूचक अथवा संक्षिप्त आशय होता है। इस समाचार शरीर का प्राण भी कहा जा सकता है।”

वेस्टली के अनुसार, “Headlines have been called the display windows of newspaper. But they are more than that. They are also a major source of information for hasty readers.” 

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शीर्षक का उद्देश्य समाचार को विज्ञापित करना है, समाचार का सार प्रकट करना है। यद्यपि इनका प्रयोग मात्र रचना के मूल विषय की सूचना देने के लिए हुआ था, परन्तु कालान्तर में इसमें कलात्मक प्रयोग कर पाठकों का ध्यानाकर्षण केन्द्रित करने उत्सुकता बढ़ाने, जनमत प्रभावित करने हेतु इसका प्रयोग होने लगा। बूलसले तो शीर्षक का उद्देश्य रचना की प्रमुख बातों का सार तत्त्व प्रकट करना, आकर्षण उत्पन्न करना, पाठ्य सामग्री को विज्ञापित करना मानता है। 

वास्तविकता यह है आधुनिक युग व्यस्तता भरा है घोर भौतिकता एवं यांत्रिकता पूर्ण युग में पाठक अत्यधिक व्यस्त है। वह पूरे समाचार की अपेक्षा केवल शीर्षक (Headlines) देखता है। यदि शीर्षक अच्छा नहीं तो अच्छे से अच्छा समाचार भी दम तोड़ देता है। समाचार का अन्तरंग, समाचार का मूलतत्त्व उसके शीर्षक से ही उद्भासित होता है। पाठक सुर्खियों से ही निश्चय कर लेते हैं कि कौन-कौन-सा समाचार पढ़ा जाये। समाचारों की साज-सज्जा में शीर्षकों का विशेष योगदान है। पृष्ठ सज्जा में कलात्मक शीर्षक अद्भुत आकर्षक भर देते हैं । 

शीर्षकों की कहानी : 

आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। उद्यमशीलता के कारण हर पत्र दूसरे पत्र से अधिक बाजी मारने के चक्कर में है। शीर्षकों का पत्र का रूप निखारने में विशेष योगदान है। सच तो यह है- शीर्षकों के आकार प्रकार के विकास की एक लम्बी कहानी है। 1702 से पूर्व अंग्रेजी व अन्य भाषाओं के पत्रों में शीर्षक नहीं होते थे। ‘डेली कौरांट’ में भी शीर्षक नहीं थे। समाचार-पत्रों की अपेक्षा इनका प्रचलन पैम्पलेट में हो चुका था। सन् 1781 में राबर्ट गार्स्ट बर्सटीन ने आधुनिक शैली के कलात्मक शीर्षक लिखे। तदोपरान्त 1789 में लन्दन टाइम्स और 1823 मैं ‘Sunday Times’ में आकर्षक शीर्षक प्रकाशित हुए। धीरे-धीरे पत्रकारों में यह सोच उत्पन्न हुई कि शीर्षक से साज-सज्जा बढ़ायी जा सकती है। 

भारत में भी पत्र-पत्रिकाओं में शीर्षकों की कलात्मकता को काफी देर बाद स्वीकार किया गया। हर रचना और हर समाचार का शीर्षक होता है। अतः शीर्षक देना जरूरी है। यह सोच परिवर्तित हो गयी और पाश्चात्य शैली के समाचार शीर्षक देने प्रारम्भ हुए। 

शीर्षकों का स्वरूप : 

शीर्षक देने के कई तरीके हैं। कभी कालमं के मध्य तो कभी बायीं ओर सटाकर कभी दायीं ओर सटाकर, कभी सीढ़ीदार बनाकर तो कभी पहली पंक्ति के बाद स्थान छोड़कर। शीर्षक चाहे एक कालम का हो या अधिक उन्हें इन प्रकारों से दिया जा सकता है। प्राचीन समय से ही कालम के मध्य शीर्षक देने की परम्परा है यह आज भी प्रचलन में है। यह अत्यन्त आसान है। 

1. कालम के मध्य बीचों-बीच :

 राष्ट्रपति हिसार।                          सख्त लू से 

   पहुंचे                                        पांच मरे 

2. बायीं ओर सटाकर : 

एक या दो कालम के ये शीर्षक दो या तीन पंक्ति के होते हैं चार के शीर्षक कम ही दिए जाते हैं। 

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3. दायीं ओर सटाकर : 

जिस तरह के शीर्षक बायीं ओर सटाकर दिये जाते हैं ठीक उसी तरह के दायीं ओर सटाकर दिए जा सकते हैं। यह पृष्ठ सज्जा में सहायक हैं, क्योंकि यदि बायीं ओर खाली स्थान रखना हो तो शीर्षक दायीं ओर दिए जाते हैं । 

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4. उद्धरण चिन्ह और योजक चिन्ह (डैश) : 

हिन्दी में सामान्यतः उद्धरण चिन्ह नहीं होते, हिन्दी में डैश देकर दायीं ओर वक्ता का नाम देने की परम्परा है, जैसे —

काश्मीर में हिंसा 

बन्द होनी चाहिए – मनमोहन सिंह 

यदि वक्ता का नाम प्रमुख समाचार के शीर्षक में दिया जाना है तो वक्ता के नाम से पूर्व विसर्ग लगानी चाहिए । 

हरियाणा में राष्ट्रपति शासन 

लागू हो : भजन लाल 

5. प्रश्नवाचक शीर्षक : 

प्रश्नचिन्हों का प्रयोग संदिग्धता सूचक है। समाचार को अधिक सनसनीखेज बनाने के लिए ऐसे शीर्षक दिये जाते हैं। सम्भवतः ऐसा प्रयोग कर पत्र असत्यता के दोष से बचना चाहते हैं, 

जैसे- नेता जी सिंगापुर में?; भारत का अगला प्रधानमन्त्री कौन ?

6. हैंगिंग इन्डेशन : 

इस तरह शीषकों में पहली पंक्ति बायीं ओर सटी होती है, दूसरी पंक्ति शुरू में स्पेस छोड़ दायीं ओर सटी होती है तीसरी भी इसी तरह दायीं ओर सटी होती है । हैंगिंग इन्डेशन (झूलता हुआ) शीर्षक का प्रयोग कम ही होता है। 

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7. सोपानी (सीढ़ीदार शीर्षक) Step Line

ये शीर्षक आमतौर पर दो या तीन पंक्ति के होते हैं इन्हें सीढ़ीदार बनाया जाता है। पहली पंक्ति बायीं ओर सटा कर लिखी जाती है दूसरी कालम के दायीं ओर सटा कर । 

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पहली पंक्ति दायीं ओर सटाकर भी लिखी जा सकती है तब दूसरी पंक्ति बायीं ओर सटाकर लिखी जायेगी। 

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पहली पंक्ति सबसे छोटी, दूसरी उससे बड़ी और तीसरी सबसे बड़ी 

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8. एक पंक्ति का शीर्षक (Cross Line) : 

यह सरल और आसान होता है, इसमें शीर्षक की एक शक्ति होती है एक पंक्ति एक कालम में भी बड़ी हो सकती है। यह दोनों तरफ कालम को छूती है। कम महत्त्व के समाचार इसी प्रकार के शीर्षक रखते हैं। यह छोटे टाईप में होती है। 

9. दो पंक्ति का शीर्षक (Double Cross Line Or Full Line) : 

जब शीर्षक एक या दो कालम का हो और उसकी दो पंक्तियां हों तो उसे दो पंक्ति का शीर्षक कहते हैं । 

10. विलोम स्तूपी शीर्षक (Inverted Pyramid ) : 

पहली पंक्ति क्रास लाइन की तरह पूरे कालम को छूती है। दूसरी पंक्ति उससे छोटी तीसरी उससे भी छोटी होती है। यह कालम के मध् य में दी जाती है। स्तूप का विपरीत रूप प्रकट करने के कारण इसे Inverted Pyramid विलोम स्तूप कहा जाता है। इस तरह के शीर्षक विदेशी पत्रों में अधिक होते हैं। भारतीय पत्रों में ऐसे शीर्षक देने का प्रचलन है पर भारत में विलोम स्तूपी शीर्षक दो या तीन पंक्तियों से अधिक के नहीं होते। अधिक पंक्तियों का यह शीर्षक कर देता है। 

11. कटि शीर्षक (Waist Line Or Long Short Long ) : 

यह शीर्षक एक या दो कालम का होता है। यह एक ही टाईप में तीन पंक्तियों का होता है। पहली पंक्ति पूरी दूसरी उससे छोटी, तीसरी पूरी होती है। इस शीर्षक में रूपसी के कटि भाग जैसा सौन्दर्य रहता है। हिन्दी में ऐसे शीर्षक का प्रचलन है। 

12.  कपाली शीर्षक : 

इसे मस्तक रेखा शीर्षक भी कहा जाता है। शीर्षक के ऊपर और कुछ छोटे टाईप में जो शीर्षक दिया जाता है उसे कपाली कहते हैं । यह कम शब्दों का शीर्षक प्राय: कॉलम के मध्य या बायीं ओर होता है तथा इसके नीचे रूल दी जाती है। कपाली शीर्षक अपना अस्तित्व स्वतन्त्र रखता है। इसका प्रयोग पाठकों का घटना की ओर आकृष्ट करने हेतु किया जाता है। ऐसे शीर्षक कालम के मध्य में दिया जाता है। कभी-कभी यह पूरी पंक्ति का होता है। 

13. ब्लॉक शीर्षक (Block Head) : 

मुख्य शीर्षक बायीं ओर से शुरू होकर कॉलम पूरा कर लेता है। तो उसके नीचे बिन्दु लगाकर कुछ खाली स्थान छोड़कर दायीं ओर दूसरा हल्के टाईप का शीर्षक दिया जाता है। बिन्दु देना कोई जरूरी भी नहीं। इसी तरह शीर्षक अलग-अलग ब्लॉक में नजर आता है। भारत में अभी ऐसे शीर्षक देने का प्रचलन कम ही है। 

14. पताका शीर्षक (Banner Head) : 

पत्र के मुख्य पृष्ठ पर आठ या बारह कॉलम में छाया एक मुख्य शीर्षक पताका शीर्षक कहलाता है। यह ऐतिहासिक महत्त्व का समाचार शीर्षक होता है। अन्य शीर्षक उस शीर्षक के नीचे दिखाई देते हैं, जैसे— पताका, ध्वज या झण्डा शीर्षस्थ हैं। उसी प्रकार महत्त्वपूर्ण समाचार का शीर्षक देने का प्रकार पताका शीर्षक है। यदि किसी विशिष्ट समाचार को सर्वाधिक महत्त्व देना हो तो बायीं ओर ऊपर कॉलम से ऊपर दायीं ओर अन्तिम कॉलम को छूने वाला शीर्षक मोटे टाईप में दिया जाता है |

जैसे— बैनर लटका हो। यदि ऐसा शीर्षक अन्दर के पृष्ठों में हो तो उसे बाइण्डर (Binder) कहते हैं। 

15. गगन रेखा (Sky Line) :

यह शीर्षक मुख्य पृष्ठ पर नाम के ऊपर दिया जाता है। समाचार यदि विशेष कोटि का हो तो भी गगन रेखा शीर्षक दिया जाता है। 

16. छिन्नबाक्स : 

बाक्स के ऊपर यदि लाईन के बीच में से काटकर शीर्षक दिया जाये तो छिन्न बाक्स शीर्षक बनाया जाता है। आजकल इसका प्रचलन बढ़ रहा है। यह शीर्षक एक या दो कॉलम तक उपयुक्त माना जाता है। 

17. राकेट शीर्षक (Rocket Head) : 

यह आधुनिकतम, किन्तु कठिन शीर्षक है। इसे समाचार से साथ ऐसे जोड़ा जाता है कि समाचार व शीर्षक में कोई अन्तर नहीं रहता। जब समाचार को इस तरह प्रतिपादित किया जाये कि उसका महत्त्वपूर्ण अंश शुरू में मोटे टाईप में दिया जाये और उसके बाद छोटे टाईप में शीर्षक दे दिया जाये तथा शेष भाग में समाचार को बड़ी टाईप में दिया जाये तो रॉकेट शीर्षक माना जाता है। यह शीर्षक देना कठिन है । इसे अधिकांश पत्रकारों ने अपनाने की चेष्टा नहीं की, फलस्वरूप यह प्रचलन में नहीं है। 

फीचर के शीर्षक दो प्रकार के होते हैं- 

1. आमुख शीर्षक (Teller Headline),

2. अंध शीर्षक (Teaser Headline) 

आमुख शीर्षक कथा के कथ्य की ओर इंगित करने वाला होता है। जबकि अंध शीर्षक पूरक शीर्षक के नाम से भी जाना जाता है यह लाक्षणिक रूप में ही विषय की ओर संकेत करता है। 

शीर्षक संरचना करते समय ध्यान देने योग्य बातें:

शीर्षक रचनाकार ही देता है। यह रचनात्मकता समाचारदाता (संवाददाता), उप-सम्पादक, समाचार सम्पादर्क की हो सकती है। शीर्षक तथ्यात्मकता से परिपूर्ण हो तथा समाचार का मूल भाव प्रकट करने में सक्षम हो ।

शीर्षक क्या कहता है? शीर्षक निर्धारित स्थान में सही बैठ सके। शीर्षक से समाचार का समाचारत्व पता चलता है। शीर्षक ‘कम शब्दों में लिखा जाता है ऐसे शब्दों का चयन जरूरी है जिसमें कम अक्षर आयें। संख्या यदि छोटी हो तो अकों में दी जा सकती है, जैसे चालीस के स्थान पर 40, बड़ी संख्या तो अक्षरों में ही देनी चाहिए। कतिपय राजनेता, खिलाड़ी, साहित्यमनीषी, कलाकार विश्व विख्यात हैं उनका नाम संक्षेप में दिया जाता है। इसी तरह राजनीतिक दल, कई देशों के संक्षिप्त नाम भी प्रयुक्त किये जा सकते हैं। शीर्षक वर्ण्यवस्तु की सत्यता को प्रकट करने वाला हो। उसमें समाचार की पूरी व्याख्या करने की क्षमता हो। यदि शीर्षक सौन्दर्यपूरित होगा तो समाचार भी पठनीय होगा । 

अन्त में कहा जा सकता शीर्षक देना एक कला है। आर्थर क्रिश्चियनसन तो शीर्षक की भाषा-शैली पर अधिक बल देते हुए उसी शीर्षक को अच्छा मानते हैं जो सशक्त बोलचाल की मुहावरेदार भाषा में लिखा जाये। हर समाचार की अपनी प्रकृति है उसी के अनुरूप उसकी भाषा-शैली होती है जैसे वाणिज्य समाचार की भाषा खेल समाचार से भिन्न होगी। अतः समाचारदाता को अपने समाचार जगत की पारिभाषिक, व्यावहारिक शब्दावली का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए । कई बार समाचार का शेष भाग अन्य पृष्ठ पर दिया जाता है। हिन्दी पत्रों में प्रथम पृष्ठ के समाचारों के शीर्षक का शेष भाग अन्य पृष्ठ में देने का प्रचलन है। उप-सम्पादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शेषांश का शीर्षक पहले अर्थात् मूल शीर्षक से मेल खाता है। ऐसा न करने पर पाठक वर्ग को असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।

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