What is the latest method of decoration and layout of a newspaper? | समाचारपत्र की साजसज्जा और रूप विन्यास की आधुनिकतम विधि क्या है ?

मनुष्य का स्वभाव है वह सुन्दर वस्तु के प्रति अवश्य आकृष्ट होता यदि समाचार-पत्र का चेहरा उतरा हुआ, उदास हो और रुदन-सा करता दिखाई दे तो पाठक उसकी ओर आकृष्ट नहीं होगा। हर वस्तु का रुपाकर्षण, गुण इत्यादि देखकर ही मनुष्य आकृष्ट हो पाता है। संभवतः यही कारण है कि समाचार पत्रों की साज-सज्जा, रुप विन्यास के विषय में पत्रकार चिन्ता करने को बाध्य हुए। 

मार्क टवेन की मान्यता है समाचार-पत्र का पहला कर्त्तव्य है कि वह सुन्दर दिखाई दें। जैसे किसी कक्ष को सौन्दर्य प्रदान किया जाता है ठीक उसी प्रकार समाचार-पत्र प्रत्येक दृष्टि से सुन्दर बन पड़े, ऐसी चेष्टाएं की जाती हैं। मनुष्य का स्वभाव है कि वह सौन्दर्य से प्रेम करता है। अपने आस-पास सौन्दर्य स्थापना में जीवन तक लगा देता है। किसी उद्यान को कांट छांट कर अभिराम बनाने के प्रयास होते हैं। 

समाचार-पत्रों में सौन्दर्य (समाचारपत्र की साजसज्जा) लाने के लिए परिवर्तनशीलता का सिद्धात लागू किया जाता है अर्थात् जो प्रतिपल परिवर्तित हो, सौन्दर्य उसी में रहता है, गतिशीलता में रहता है । समाचार-पत्रों में समाचारों के अतिरिक्त समाचारेत्तर सामग्री भी होती है। समाचार तथा अन्य सामग्री की साज-सज्जा आवश्यक है। हिन्दी पत्रकारिता में साज-सज्जा की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था, परन्तु पाश्चात्य प्रभाव से साज-सज्जा होनी प्रारम्भ हुई। 

समाचार विभिन्न स्त्रोतों से मिल तो जाते हैं तभी न्यूज डेस्क पर यह प्रश्न उप-सम्पादक या कॉपी सम्पादक के मन और मस्तिष्क को झकझोरता है कि समाचार किस प्रकार प्रकाशित हो कि कलात्मकता अनूठी बन पड़े। ब्रिटेन तथा अन्य देशों में साज-सज्जा की विभिन्न प्रविधियां हैं, परन्तु हिन्दी पत्रकारिता में पाठकों को नूतन समाचार देना ही पत्रकारिता का उद्देश्य माना जाता रहा। स्पष्ट तो यह है रूप विन्यास में सौन्दर्य बोध की आवश्यकता है। 

मनुष्य का सौन्दर्य प्रेमी होना साज-सज्जा आने का मूल कारण बना। समाचार पत्रों के बीच बाजारी प्रतिस्पर्धा नै समाचार पत्रों को सुन्दर होने के लिए बाध्य कर दिया। स्पष्ट सी बात है कि आधुनिक युग में वही पत्र आगे बढ़ सकता है जिसमें साज-सज्जा को हो। इधर विज्ञापन व्यवसाय निरन्तर विकसित हुआ है। समाचार-पत्रों का पूरा व्यय केवल पाठक पूरा नहीं कर पाते। इसी कारण पत्रों विज्ञापनों की आवश्यकता बनी रहती है। विज्ञापनदाता उसी पत्र को विज्ञापन देते हैं जिनकी प्रसार संख्या अधिक है। प्रसार संख्या अधिक हो, पाठक पत्र को चाव से खरीदें और पढ़ें, इसलिए साज-सज्जा रूप-विन्यास आवश्यक है। आधुनिक युग यान्त्रिकता का युग है। मुद्रण कला का निरन्तर विकास हुआ है। फलस्वरूप कलात्मक, रंगीन मुद्रण हो रहा है।

साज-सज्जा के आयाम इस प्रकार हैं-

1. डिजाइन (Design) 

2. मेकअप (Makeup) 

3. ले-ऑउट (Layout) 

1. डिजाइन (Design)

इसका अर्थ है- समूचे समाचार-पत्र का एक खाका, कच्चा प्रारूप तैयार करना। अल्बर्ट सूटान के अनुसार- एक पत्रकार और एक चित्रकार दोनों के डिजाइन कार्य में एक समानता है। चित्रकार रंग, तूलिका आदि लेकर कैनवास के सम्मुख सोचता है कि प्रारूप क्या हो जबकि पत्रकार पत्र से पूर्व यह निर्धारण करता है कि प्रारूप क्या होगा। 

इसके अन्तर्गत यह निश्चित किया जाता है कि पृष्ठ आकार क्या होगा, पत्र का नाम मुख्य पृष्ठ पर कहा होगा दायीं दिशा में, बायीं दिशा में या ऊपर मध्य में, यह भी निर्धारित किया जाता है कि पृष्ठों का आकार क्या होगा तथा कुल कितने पृष्ठ होंगे, कौन-सी सामग्री कहां दी जायेगी शीर्षक, नामादि व अन्य सामग्री का टाईप क्या होगा। पूरा समाचार एक ही पृष्ठ में होगा या शेषांक भी देने की योजना रहेगी। 

विज्ञापन कहा दिए जाएंगे, मुख्य पृष्ठ पर विज्ञापन होंगे अथवा नहीं? इन सभी बातों का निश्चित कर लेना डिजाइन है। पत्र के स्वामी, प्रधान सम्पादक, सम्पादन मण्डल के वरिष्ठ सदस्य यह निर्धारण करते हैं। डिजाइन स्थायी होता है इसमें अधिक परिवर्तन नहीं किये जाते । अधिक परिवर्तनों से पत्र अपनी पहचान खो बैठता है। 

2. मेकअप (Makeup) : 

यद्यपि डिजाइन समाचार-पत्र में स्थायी रूप से एक ही रहता है, मेकअप में परिवर्तनशील बनी रहती है। सम्पादकीय विभाग का परन्तु पूरा मन और मस्तिष्क मेकअप में जुटा रहता है। मेकअप सौन्दर्य को निखारता है उसे उत्कृष्ट बना देता है। जैसे महिला सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग कर अपने सौन्दर्य को संवारती है, अभिवृद्धि करती है ठीक उसी प्रकार मेकअप द्वारा पत्र पृष्ठों की सज्जा के प्रयास किये जाते हैं। मेकअप के सामान्यतः पांच सिद्धान्त माने गए हैं 

1. संतुलन का नियम 

2. फोक्स का नियम 

3. विरोधाभास का नियम 

4. संगति का नियम 

5. गति का नियम 

1. संतुलन का नियम : 

संतुलन से सीधा अभिप्राय यह है कि पृष्ठ पर समाचारों तथा चित्रों को इस प्रकार दिया जाये कि सारे पृष्ठ पर एक संतुलन बना रहा। तराजू के दोनों पलड़ों के संतुलन जैसा संतुलन पृष्ठ में तभी उत्पन्न हो सकता है जब पृष्ठ को ऊपर से नीचे, बायें से दायें बीचों-बीच मोड़ा जाये तो दोनों ओर टाईप और चित्रों की समरूपता हो । 

तिरछे ऊपरी बायें और नीचे दायें और या ऊपर बायी नीचे बायीं | ओर पृष्ठ के चारों भागों में एक समरूपता का लाना ही संतुलन है। जब पर्याप्त मात्रा में समाचार या चित्र उपलब्ध न हो तो भी जितना बन पड़े संतुलन लाने की प्रक्रिया असम संतुलन कही जाती है। मान लीजिए किसी दिन एक समाचार तो विशिष्ट कोटि का हो बाकी समाचार कम महत्त्वपूर्ण तो असम संतुलन अपनाया जा सकता है।

 ऐसे पृष्ठ में उस विशिष्ट समाचार को कहीं भी देकर बाकी पेज में संतुलन लाने की चेष्टा की जाती है। यदि संतुलन का नियम हर रोज अपनाया जाये तो और नीरसता हाथ लगेगी। यह भी आवश्यक नहीं कि संतुलन लाने योग्य सामग्री उपलब्ध हो जाये । असम सन्तुलन में पत्रकार सुविधा होती है कि वह पत्र को आकर्षण प्रदान करने की चेष्टा कर पाता है, 

परन्तु समसंतुलन जैसी प्रतिबद्धता नहीं रहती। एक संतुलित पृष्ठ तभी कहलायेगी जब सजावट सारे पृष्ठ पर एक जैसी हो । समसन्तुलन एक दुःसाध्य पद्धति है इसलिए कम प्रयोग में लायी जाती है! असंतुलन द्वारा सज्जा चित्रों के बिना भी संभव है । 

2. फोक्स का नियम : 

आई.ए. रिचर्डस ने ‘How to read a page नामक पुस्तक में यह माना है कि मुद्रित अक्षरों का पाठक पर गहरा. असर पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि वह स्थान निर्धारित किया जाये जहां पाठकों की दृष्टि सबसे पूर्व पड़ती है। उस स्थान पर अत्यधिक महत्त्व का समाचार होना चाहिए। 

सामान्यतः पाठक दृष्टि मुद्रित पृष्ठ पर ऊपरी भाग में बायीं ओर जाती है। स्पष्ट है कि समाचार पत्र में पृष्ठ के ऊपरी भाग में फोक्स बिन्दु होता है। लगभग सभी पत्रों की यही राय है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण समाचार प्रथम लीड कहलाता है। ऊपरी भाग में दायीं ओर सैंकिण्ड लीड का समाचार देने की परम्परा है। फोक्स सिद्धांत को वलय पट्टी सिद्धांत भी कहा जाता है। यह पताका या बैनर शीर्षक जैसा है। 

3. विरोधाभास का नियम : 

विरोधाभास उत्पन्न करने के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु को कम महत्त्व की सामग्री से घेर दिया जाता है। इससे एक अदभुत आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। ऐसा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए और तरीके भी प्रयोग में लाये जाते हैं जैसे शीर्षक को कॉलम में न देकर खाली स्थान में देना, चित्रों का प्रयोग करके अथवा टाइप में अन्तर ला कर । 

4. संगति का नियम :

यह सिद्धांत सारे पृष्ठ को एक ही इकाई (Unit) मानता है। इसमें पृष्ठ को ऊपरी, निचला, दायां, बाया। भाग मानकर अलग-अलग सज्जा नहीं की जाती है। पत्रकार का यह प्रयास रहता है कि पृष्ठ में कहीं कोई खाली या रिक्त स्थान न रखा जाये अपितु सारे

पृष्ठ को एक ही जैसी सामग्री से युक्त किया जाता है। इस प्रणाली में समाचारों को अस्त-व्यस्त तरीके से पृष्ठ पर देने की चेष्टा की जाती है कि पाठक यह नहीं जान पाता कि आज का मुख्य समाचार कौन-सा है। महत्त्वपूर्ण समाचार बॉक्स आइटम कोष्ठक समाचार के रूप में दिया जाता हैं। 

5. गति का नियम : 

इसके अन्तर्गत सारे पृष्ठ में एक गत्यात्मक लाने का प्रयास किया जाता है। यद्यपि यह सिद्धान्त कम ही प्रयोग में लाया जाता है, परन्तु यह अत्यन्त उपादेयी है, क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार पाठक की दृष्टि महत्त्वपूर्ण समाचार पर अवश्य पड़नी चाहिए। इसलिए सारी सामग्री को इस प्रकार प्रतिपादित किया जाता है कि महत्त्वपूर्ण सामग्री की एक गति बनी रहे । 

3. ले-ऑउट व डम्मी : 

डम्मी में किसी भी आकार का पृष्ठ लेकर यह निर्धारण किया जाता है कि समाचार, चित्र, कार्टून, विज्ञापन इत्यादि किस प्रकार प्रस्तुत किये जाएंगे। इस डम्मी निर्माण में स्टाईलशीट (Style Sheet) की भी सहायता ली जा सकती है। इससे कॉपी में कसावट आ जाती है। Style book या Style Sheet एक निर्देश पुस्तिका है जिससे डम्मी निर्माण में निर्देशों का ध्यान रखा जा सकता है। डम्मी सारे मैटर की बनानी चाहिए। डम्मी बनाने के बाद में सुधार की गुंजाइश रहती है। 

ले-ऑउट में मुद्रित कतरनों को स्टील-शीट अनुसार ऐसे चिपकाया जाता है जैसे मुद्रण के बाद पृष्ठ बन पड़ेगा। डम्मी बनाने का लाभ नवोदित या नए उप-सम्पादकों को मिलता है, क्योंकि इससे कोई भी सामग्री प्रकाशित होने से नहीं छूट पाती, स्मरण बना रहता है जबकि वरिष्ठ पत्रकारों का मस्तिष्क ही डम्मी का निर्माण कर लेता है उन्हें अनुभव प्रवणता से सारे काम पूरे करना अच्छा व सुविधाजनक लगता है । 

अन्दर के पृष्ठों की सज्जा : 

जो समाचार-पत्र राष्ट्रीय स्तर का होता है या व्यवस्थित होता है उसमें अन्दर के पृष्ठों की साज-सज्जा भी विशेष महत्त्व रखती है।

कभी-कभी चौक-शैली (circus attern) का प्रयोग कर सौन्दर्य लाने का प्रयास किया जाता है। 

इसके अन्तर्गत समाचार के शीर्षक मोटे टाईप में तथा पताका या बैनर शीर्षकों की संख्या दो तक भी दी जाती है। जब भी अन्दर के पृष्ठ के प्रति आकर्षण उत्पन्न करना हो ऐसा प्रयोग सफल रहता है। अन्दर के पृष्ठों की साज-सज्जा में विज्ञापनों का सहारा भी लिया जाता है। यह व्यवस्था दो तरह की है 

1. खुला पृष्ठ (Open Page) : 

इसके अन्तर्गत पेज में बहुत कम विज्ञापन दिये जाते हैं, विज्ञापनों को पृष्ठ के दायीं ओर दिया जाता है। इस तरह के पेज खुला पृष्ठ कहलाते हैं। 

2. सघन पृष्ठ (Tight Page) : 

उन पृष्ठों को कहते हैं जिनमें विज्ञापनों की संख्या अधिक होती है उन सारे विज्ञापनों को ओर समाचारों के बीच में स्थान दिया जाता है। पृष्ठ के दोनों असम संतुलन और स्तूप शैली भीतरी पृष्ठ की साज-सज्जा के लिए प्रचलित हैं। 

असम संतुलन के अन्तर्गत सबसे अधिक महत्त्व के समाचार को पृष्ठ के ऊपरी भाग में बायीं ओर स्थान दिया जाता है यदि कोई चित्र दिया जाना है तो सबसे ऊपर मध्य में दिया जाता है शेष स्थान पर समाचार छोटे टाईप में दिये जाते हैं । स्तूप शैली के अन्तर्गत सबसे मोटे टाईप के शीर्षक ऊपरी भाग में बायीं ओर देकर क्रमशः छोटे टाईप के शीर्षक फैलाने की चेष्टा की जाती है। 

सम्पादकीय पृष्ठ की साज-सज्जा : 

यह पृष्ठ अत्यन्त गम्भीर, गरिमापूर्ण तथा वैचारिक माना जाता है दूसरे पृष्ठों को समाचार पृष्ठ और इस पृष्ठ को वैचारिक पृष्ठ की संज्ञा दी जाती है। सम्पादकीय अग्रलेख, पाठकों के पत्र, हास-परिहास, व्यंग्य पट्टिका आदि से युक्त इस पृष्ठ में विज्ञापन देने की व्यवस्था नहीं की जाती। 

वास्तव में उपर्युक्त साज-सज्जा के सिद्धान्तों के अतिरिक्त फोटो, मुद्रणकला, शीर्षक कला वो अभियान बन सकते हैं जिन पर पृष्ठ सज्जा निर्भर है। सौन्दर्यबोध एक दृष्टिकोण है जो हर पत्र का मौलिक ही होता है। नकल करके पृष्ठ सौन्दर्य अर्जित नहीं किया जा सकता।

फोटो द्वारा समाचार-पत्र की साज-सज्जा में चार चांद लग जाते हैं। यदि फोटो भद्दी या अस्पष्ट हो तो साज-सज्जा में ही अन्तर आ जाता है। फलस्वरूप प्रसार संख्या घटती है। रूप-विन्यास शीर्षक के स्थानापन्न करने से आ जाते हैं।

ब्रूस वेस्टले की मान्यता है- Make up is largly a matter of placement of headline and art शीर्षकों का कलात्मक रूप में स्थापन ही मेकअप है। कहा जाता है यदि एक भी अक्षर शीर्षक में आ सके तो शीर्षक गलत है। समाचार-पत्र का नाम के दोनों ओर बने विज्ञापन को (Ears या Pancle) भी कहते हैं। 

कॉलमों की संख्या कम-ज्यादा करके भी सौन्दर्य लाने का प्रयास किया जाता है। विज्ञापनों की भरमार से सौन्दर्य नहीं रह पाता । सामान्यतः विज्ञापन और अन्य सामग्री का औसत 40 : 60 का माना गया है। समाचार-पत्र के सौन्दर्य अभिवृद्धि में भिन्न-भिन्न तरीके मुद्रण टाईपों का प्रयोग करने की चेष्टा भी रहती है। अनुवादकला साज-सज्जा में सहायक है । 

शाब्दिक अनुवाद की अपेक्षा भावानुवाद, सारानुवाद आदि का सहारा लेकर विषयवस्तु को अभिनव बनाया जा सकता है। वस्तुतः कुछ छपने से रह न जाये, यही भय साज-सज्जा का विरोधी है। पृष्ठ सज्जा में समाचारों की लीड, शीर्षक, इन्ट्रों सभी का महत्त्व है। मुद्रण से ही सजावट नहीं होती। कभी-कभी खाली सफेद स्थान छोड़ने से भी सौन्दर्य आ जाता है। 

पृष्ठ सज्जा में फोटो, मुद्रण कला, खाली स्थान, शीर्षकों में भिन्न टाईप, अनुवाद, कार्टून: आदि से सुन्दरता आती है। पहले पृष्ठ को तो हर कोई महत्त्व देता है। क्या वर्गीकृत विज्ञापन पृष्ठ, वाणिज्य पृष्ठ का भी कोई सौन्दर्य हो सकता है यह चिन्तन का विषय है ?

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