What is the definition of cartoon art? | कार्टून कला की परिभाषा क्या होती है ?

आधुनिक युग में कार्टून विहीन पत्र-पत्रिका की परिकल्पना नहीं। की जा सकती। कार्टून अत्यन्त हास्योत्पादक, व्यंग्यात्मक, रोचक होता है। कार्टून का शाब्दिक अर्थ तो किसी चित्र का रफ डिजाइन करना या कच्चा खाका बनाना है। कार्टून का प्रारम्भ कब हुआ इस बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। 

इतना अवश्य है विख्यात व्यंग्य चित्रकार लीच के निर्देशन में इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में दीवारों पर कार्टून की एक प्रदर्शनी 1843 में लगायी गयी थी। इन कार्टूनों को ‘पंच’ नामक हास्य पत्रिका (इंग्लैण्ड) में प्रकाशित किया गया। कार्टून रोचक, लुभावने, परन्तु जीवन की आलोचना करने में सक्षम हैं। 

तूलिका की कुछ निर्मित रेखाएं जीवन्त व्यक्तित्व या घटना का रहस्य देने में सक्षम हैं । पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यंग्य चित्रों की विशिष्ट भूमिका है। अधिकांश कार्टूनिस्ट राजनीति के कार्टून अधिक बनाते हैं उनमें सरसता ला कर राजनीति के बदले परिदृश्यों से हमें अवगत कराते हैं। भारतीय समाचार-पत्रों में कार्टून व व्यंग्य चित्रों का प्रचलन काफी देर बाद प्रारम्भ हुआ। शुरू में तो चित्रों के साथ नीचे हास्योत्पादक कैप्सन देने का भी रिवाज था। 

धीरे-धीरे इन व्यंग्यचित्रों की प्राणवत्ता, अर्थवत्ता और आवश्यकता को समझा जाने लगा। कार्टूनों में कलात्मकता लाने के लिए प्रयास भी किए गए। आधुनिक युग में कार्टूनों में प्रतीकात्मकता अधिक है । प्राचीन अजन्ता की गुफाओं में व्यंग्य चित्रों के उदाहरण मिले हैं। यही नहीं चीन, मिश्र और भारत में चित्रों में हास-परिहास विनोदशीलता से युक्त तीक्ष्ण कटाक्षपूर्ण भीत्ति चित्र मिले हैं। कई मध्य युगीन ग्रन्थों में विनोदपूर्ण चित्र हैं। 

विशाल उदर वाले वामन तथा लाफिंग चित्र व्यंग्य चित्र ही हैं। कहा जा सकता है कि व्यंग्यानुभूति से पूर्ण चित्रों का प्रचलन काफी पुराना है। बुद्धा के इटली में 17 वीं शताब्दी में विरोध जताने के निमित्त व्यंग्य चित्रों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। एनीवाल केरास्त (रोमन एकेडमी अध्यक्ष) ने पोप का पुरजोर विरोध करने के लिए चित्रों को महत्त्व दिया । पुतलानुमा इन चित्रों को कैरीकेचर कहा जाता था, वहां इटली के लोग इन्हें जलाते थे। 

कैरीकेचर और कार्टून

फ्रांस, इंग्लैण्ड में भी इसका प्रचलन प्रारम्भ हुआ। कैरीकेचर और कार्टून में अन्तर होता है। कैरीकेचर व्यक्ति का हास्यस्पद चित्र मात्र है जबकि कार्टून में राजनीतिक, सामाजिक संदर्भों को बड़े कलात्मक और सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। कैरीकेचर तो किसी व्यक्ति के व्यंग्यात्मक भाव-भंगिमाओं का प्रस्तुतीकरण का तरीका है। कार्टून कई प्रकार के होते हैं जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, व्यंग्य पट्टी, जे.बी. कार्टून हैं। 

राजनीतिक व्यंग्यपूर्ण कार्टून आधुनिक युग में काफी प्रचलित हैं इनमें राजनेताओं और प्रंगों का हास-परिहासपूर्ण चित्र होता है। कार्टूनिस्ट को दैनन्दिन समाचारों का सूक्ष्मता व गहनता से अध्ययन करना पड़ता है। वह समाचारों के जंगल में से ही अधिक महत्त्वपूर्ण, ज्वलन्त विषय का चयन कर रेखा द्वारा चित्रांकन कर कार्टून बना देता है। साथ ही कोई संवाद और उक्ति भी छोड़ता है। यह सब करने के लिए राजनेता के जीवन स्वभाव, अभिरुचि को जानना भी जरूरी है। कार्टूनिस्ट को विविध विषयों का सम्यक ज्ञान भी जरूरी है। 

कभी-कभी मिथक बनाने के लिए पौराणिक सन्दर्भों को भी ग्रहण पड़ता है । राजनीतिक स्थितियों में निरन्तर बदलाव आते रहते हैं । अतः कार्टूनिस्ट को शीघ्रातिशीघ्र काम करना होता है। सामाजिक कार्टून समाज की समस्यामूलक स्थितियों को उजागर करने वाले होते हैं। इनमें परिवेश की घटनाओं, सन्दर्भों को विषय बनाया जाता है। जीवन और जगत के सन्दभों पर व्यंग्य, परिहास सम्बन्धी कार्टून बनाये जाते हैं। 

जे.बी. कार्टून

इनमें जनसम्पर्क का वैशिष्ट्य निहित होता है। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में अंग्रेजी पत्रों की परिपाटी का अनुसरण कर व्यंग्यपूर्ण पट्टी का प्रचलन भी हुआ। इनमें कथा प्रधानता होती है। बाल-जगत में इन्हें काफी रुचि से देखा जाता है अर्थात् बालकों में इनकी काफी लोकप्रियता है। कई बार मुख्य पृष्ठों में विभिन्न शीर्षकों से व्यंग्यचित्र दिये जाते हैं। इन्हें जे.बी. कार्टून भी कहते हैं। इनका विषय सामाजिक, राजनीतिक वैयक्तिक हो सकता है। 

यदि किसी विशिष्ट व्यक्ति का निधन हो जाये अथवा कोई भीषण दुर्घटना हो तो जे.बी. कार्टून नहीं दिया जाता, इससे पत्र की शालीनता का पता चलता है । किया प्रारम्भ में विलियम होगार्थ (1697-1764) ने व्यंग्य चित्रों की रचना की। इंग्लैण्ड के इस कार्टूनिस्ट को कार्टून दुनिया का पितामह माना जाता है। कालान्तर में जान लीच ने व्यंग्य चित्रों का सृजन अन्य प्रमुख कार्टूनकारों में फुगास, शैफार्ड, लेंगडन डेविडलों, रेनोलडस, रौलिन्सन हैं। भारत में सर्वप्रथम 19वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में कार्टून प्रारम्भ हुई। एक पारसी ने इसका सूत्रपात किया था। 

भारत के प्रमुख कार्टूनिस्टों में शंकर, आर. के. लक्ष्मण, सामू, आबिद सुरती, काजिलाल, रंगा, सुधीर दर, भारियो, अबू अब्राहम, डिजी आदि हैं। कला विलियम होगार्थ द्वारा बनाये कार्टून सेंट गेलरी में सुरक्षित हैं। इंग्लैण्ड में जानलीच ने पंच (1841) को कार्टून प्रचार का माध्यम बनाया। फ्रांस में भी चारीबारी पत्र ने कार्टून छापे । हिन्दी पंच, ग्रिप (कनाडा) सिडनी पंच (आस्ट्रेलिया) कार्टून विकसित करने वाले पत्र हैं। 1935 में शंकर ने हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान में व्यंग्य चित्र प्रकाशित किये। 

भारतीय कार्टून पत्रकारिता के इतिहास में शंकर का योगदान अद्वितीय है। केरल का यह प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट बम्बई क्रानीकल, हिन्दुस्तान टाइम्स आदि में अत्यन्त सूक्ष्म, प्रभावात्मक, जीवन्त कार्टून देता रहा । पराधीन भारत में समसामयिक राजनीतिक वातायन को इंगित करने में वह सक्षम रहा। शंकर्स वीकली का प्रणेता 1948 में ही कार्टून पत्रकारिता को पूर्णतः समर्पित पत्रिका दे सका। स्वतन्त्रता के उपरान्त हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में कार्टून का प्रचलन बढ़ा है। प्रत्येक पत्र का मुख्यपृष्ठ जे.बी. या राजनीतिक कार्टून से सज्जा पाता है। 

कार्टूनिस्ट हास्य

कार्टूनिस्टों की एक लम्बी पंक्ति कार्टून की दुनियां में सेवायें दे रही हैं इनमें प्राण, नेगी, मनोरंजन, शिक्षार्थी, अहमद, सुनील चटोपाध्याय, संदीप जोशी आदि मुख्य हैं। पंकज गोस्वामी, तेलंग आदि भी विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। आर.के. लक्ष्मण प्रख्यात कार्टूनिस्टों में से हैं जिन्होंने 1946 में मद्रास जैमिनी स्टूडियो से शुरूआत की। कार्टून-फिल्मों का निर्माण करने वाली यह संस्था लक्ष्मण की कर्मभूमि थी। कालान्तर में उन्होंने टाइम्स ऑफ इण्डिया को सेवाएं दी। सामुवैल (सामु) के नाम से प्रसिद्ध है। यायावरी प्रवृत्ति का यह कार्टूनिस्ट हास्य व्यंग्य का सम्राट है। 

सामु का विचार है जब तक हास्य-व्यंग्य भरपूर न हो, कार्टून बन ही नहीं सकता। आधुनिकता, यान्त्रिकता को सामु ने ‘बाबू’ संस्कृति के अन्तर्गत नवभारत टाइम्स में दिया है। उन्होंने ही सर्वप्रथम नवभारत टाइम्स में ‘बाबू जी के शीर्षक से इसका प्रचलन किया, हिन्दुस्तान में ‘आजकल’ ऐसे ही जे.बी. कार्टून हैं। हास-व्यंग्य की दृष्टि से मतवाला, मौजी, हिन्दू पंच, सरपंच, हरिश्चंद मैग्जीन, हिन्दी प्रदीप, ब्राह्मण, भारत वागीश शास्त्रीकृत किसमिश (1918) के दारानाथभट्ट तथा भगवत स्वरूप चतुर्वेदी कृत नोकझोंक (1937) अमृत लाल नागर, नरोत्तम नागर कृत चकल्लस हास्य सामग्री से ओतप्रोत रहे। 

1960 में लंठ आजमगढी ने हंसोड नामक पत्रिका प्रकाशित की आत्मा नंद सिंह ने आत्मा (1961) में व्यंग्य चित्रों को महत्त्व दिया। नरेन्द्र कुमार चतुर्वेदी ने 1967 में जोकर का सम्पादन किया। रामावतार चेतन ने 1961 में रंग में हास्य-व्यंग्य का विशिष्ट रंग निकालने का प्रयास किया । हुल्लड़ मुरादाबादी, अरुण रंजन, बालेन्दु शेखर तिवारी ने व्यंग्यात्मक साहित्य को अग्रसर करने का प्रयास किया। कार्टून चित्रकला का विषय है जबकि व्यंग्यात्मक लेखन एक विशिष्ट विषय है। कार्टून के सृजन में चित्रकला और व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया जाता है। इन दोनों के समवेत रूप से अद्भुत अभिव्यक्ति होती है। सच तो यह है कि कार्टून में दस हजार शब्दों के बराबर क्षमता होती है। 

तेलांग (Tailang) के अनुसार

“Any body who is mad can be come a cartoonist, you have got to be born mad or your have to become mad to become cartoonist.” 

कार्टून सृजन में प्रत्युत्पन्न मति की आवश्यकता है। सामाजिक सन्दर्भों को गहनता और सूझबूझ से पकड़ना, अपनी रचना के कथ्य को सोचकर उसके अनुरूप चित्रांकन करना पड़ता है। यदि राजनीतिक कार्टून एवं कैरीकेचर का निर्माण करना हो तो कम से कम रेखाओं से व्यक्तित्व, हाव-भाव यहां तक कि आदतों की सूक्ष्मतापूर्ण झलक मिलनी जरूरी है। सामाजिक व व्यंग्य पट्टी में सामाजिक विषयों, घटनाओं का आकलन आवश्यक है।

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