What is journalism as the fourth pillar and What is the concept of free press? | चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता क्या है और स्वतंत्र प्रेस (फ्री प्रेस) की अवधारणा क्या है?

चर्चिल का कथन है कि स्वतन्त्रता में निष्ठा रखने वाले लोग यह मानते हैं कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए स्वतन्त्र प्रेस एक सच्चा और सचेत प्रहरी सिद्ध होता है। इस पर सदा ही जोर से बहस होती रही है कि प्रेस स्वतन्त्र नही, उसे स्वतन्त्र करना होगा। 

स्वतंत्र प्रेस (फ्री प्रेस) की अवधारणा क्या है?

सच तो यह है कि अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकना चाहता । पत्रकार प्रेस की आजादी को लेकर आंदोलनधर्मी हो जाते हैं, सरकार की दुहाई देते हैं दूसरी ओर सरकार राजनेता सभी अपनी हित रक्षा में बयानबाजी करते रहे हैं। कभी-कभी यह आंदोलन अन्तरात्मा की आवाज होता है तो कभी महज़ आंदोलन बनकर रह जाता है।

यदि चर्चिल के कथन को ध्यान से पढ़ा जाये तो उन्होंने प्रेस के दायित्वों पर भी बल दिया है। पत्रकारिता आज उद्योग का रूप धारण कर चुकी है पर वह यह कोई दुकानदारी नहीं। केवल व्यवसायिकता के नाम पर आदर्शों से विमुख नहीं होना चाहिए। आज के प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्वितावादी युग में अपनी दुकानदारी चमकाने के नाम पर पत्रकार पीत पत्रकारिता करने पर उतारू जाते हैं। 

प्रैस आयोग 1954 की रिपोर्ट के अनुसार- “समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाले समाचार या सम्पादकीय विचार बाजार का बिकाऊ माल नहीं, क्योंकि उन्हीं के आधार पर देश में जनमत बनता है और सरकार की नीतियों का निर्माण होता है।” 

प्रैस की स्वतन्त्रता हर कीमत पर रहनी चाहिए, क्योंकि लोकतान्त्रिक देश में प्रैस की स्वतन्त्रता मायने रखती है। यदि कहा जाए कि लोकतन्त्र का जीवन इसी पर अवलम्बित है तो अतिश्योक्ति नहीं है। राष्ट्र का स्वरूप एवं स्वास्थ्य इसी पर आधारित है। यह तो सच है कि स्वतन्त्रता ही प्रैस की प्राणवायु है, परन्तु यह भी उतना ही बड़ा सच है कि एक स्वतन्त्र प्रेस को स्व और तंत्र में अर्थात् अपने ही नियन्त्रण में होना चाहिए। 

किसी स्वार्थवश कुछ छापना या किसी स्वार्थवश कुछ न छापना पत्रकारिता नहीं। कहा जा सकता है- पत्रकारों को आत्म निरीक्षण करना चाहिए, आत्मानुशासन का परिचय देना चाहिए। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक युग में स्वतन्त्रता के संरक्षक एवं पोषक पत्र दबावों में रहते हैं एक सीधा दबाव तो यह है कि बड़े-बड़े पत्र टी.वी. चैनल उद्योगपतियों के हाथों में फंसे हुए हैं ।

जिनके इशारे पर चलते हुए प्रैस अधिनियमों की अवहेलना हो जाती है और परिणाम पत्रकारों को भुगतने पड़ते हैं। एक और बात यह है कि यदि पत्रकार स्वयं को रिपोर्टर मानकर केवल रिपोर्ट देने पर ही बल दे सत्यनिष्ठा का दायित्व पूरा करे, हितैषिता को त्याग दे तो भी उनका दायित्व पूरा नहीं हो जाता । 

हितैषिता की यह भावना समाज के प्रति होनी चाहिए। हिंसा, वैमनस्य, साम्प्रदायिकता फैलाने का पत्रकारों को कोई अधिकार नहीं, अतः पत्रकारों को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। व्यक्तिगत सम्बन्धों की अपेक्षा विराट संदर्भों में सोचना चाहिए। राजगोपालाचार्य ने स्वतन्त्रता की इस अवधारणा में आचार-संहिता की उपयोगिता को भी अंगीकार कर लिया । 

प्रैस की स्वतन्त्रता की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए हमें दो अलग-अलग परस्पर विरोधी विचारधाराओं को समझना होगा। दो विश्वव्यापी विचारधाराएं हैं एक तो ऐसी विचारधारा है जिसे हम उदारवादी या लिबरल मान सकते हैं। इसका मत है पत्रकार को निष्पक्ष निर्भीक होकर अपना कर्त्तव्य वहन करना चाहिए। 

ऐसी अवधारणा हर कीमत पर प्रैस का कर्त्तव्य पूरा करना चाहती है। अमेरीका और ब्रिटेन के पत्रकार ऐसा ही सोचते हैं। दूसरी अवधारणा उन देशों में मिलती हैं जहां प्रैस अपने पर उद्देश्यपरकता से जोड़ती है। सोवियत रूस में यह माना गया कि प्रैस की सार्थकता उसके सोद्देश्यता पर निर्भर है। 

इस दृश्य में निष्पक्षता, तटस्थता मात्र पाखण्ड है। प्रैस की स्वतन्त्रता और तटस्थता के अपेक्षा यह जरूरी है कि प्रैस समाजोत्थान में कितनी रुचि लेती है और उसे इस कार्य का अवसर दिया जाता है या नहीं । 

पत्रकार अपने स्वामियों ही नहीं जनसाधारण के प्रति, सरकार के प्रति, व्यवसाय के प्रति भी उत्तरदायी होने चाहिए। ऐसी कौन सी विधि है जो पत्रकारों से इन सबके प्रति उत्तरदायी बन सकती है। समूचे विश्व में पत्रकारिता एक ऐसा व्यवसाय है जो आचार संहिता होते हुए भी इससे विहीन है। प्रैस को आचार-संहिता या आत्मानुशासन का परिचय देना चाहिए। 

जनता के प्रति अपने दायित्वों को समझना नहीं। राजनीतिवश कोई तथ्य तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपना मत स्वतन्त्रतापूर्वक प्रकट करना चाहिए। किसी भी प्रलोभन या लालच में पीत पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए। 

अमेरिका प्रेस स्वतन्त्रता आयोग के अध्यक्ष राबर्ट एम. हिचन्स ने कहा था कि प्रैस को अपनी आजादी कायम रखनी है तो इसका केवल एक ही उपाय है- पत्रकारों को यह समझ लेना चाहिए कि वे राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायी हैं जो समाचार-पत्र इस सिद्धान्त के विपरीत आचारण करता है और भ्रष्ट, निरंकुश और स्वेच्छाचारी नीतियां अपनाता है, उसे आजाद रहने का कोई अधिकार नहीं । 

चौथे स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता : 

ऑस्कर वाइल्ड के अनुसार- समाचार-पत्र राज्य का चौथा अंग है। उन्होंने इसे फोरथ एस्टेट (Fourth Estate) कहा है। उन्होंने इसे राज्य के बुनियादी अवयवों में धार्मिक संस्था (चर्च), सामन्तवादी वर्ग (लार्डस), जनसाधारण (पब्लिक) और पत्रकारिता (प्रैस) माने गए हैं। इन अवयवों में धार्मिक संस्थाओं का प्रभुत्व अब नहीं के बराबर है। अब लार्डस अर्थात् सामन्तवादियों के दिन लद चुके हैं। दो टूक शब्दों में सरकारें आती हैं, चली जाती हैं पर शाश्वत सत्ता तो प्रैस की ही है। 

यह जनता की वह संसद है जिसका सत्रावसान कभी नहीं होता । राजनीतिक विज्ञान के मतानुसार लोकतान्त्रिक ढांचे में विद्यमान पालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका अनिवार्य अंग हैं तो चौथे स्तम्भ के रूप में प्रैस है यह एक सेतु का कार्य करने वाला स्तम्भ है। पत्र-पत्रिकाओं में समाचार, लेख आदि का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार होता है कि यह आम पाठक के समग्र व्यक्तित्व निर्माण में सहायक हो जाता है। 

विभिन्न शीर्षको, इन्ट्रो (आमुख) से सुसज्जित रचनाएं न केवल सूचनाप्रदायक हैं। अपितु जनमत उत्पन्न करने में सहायक हैं। यह किसी भी लोकतान्त्रिक देश में चौथा आधारस्तम्भ है जिस पर लोकतन्त्र टिका है। वास्तव में पत्रकार ही समाज के सच्चे सजग प्रहरी हैं। आम जनता अपने उदरपूर्ति या व्यवसायों में इस कदर उलझी हुई है कि समाज और सरकार की अन्दरूनी सतहों पर उसकी दृष्टि नहीं जाती। 

पत्रकार खोजी पत्रकारिता का सहारा लेकर हमें वस्तु स्थितियों का सच्चा ज्ञान देते हैं तभी हमें भ्रष्टाचार, घोटाले, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी, साम्प्रदायिकता जैसी कुत्सित क्रियाओं का पता चलता है. यह समाज ही नहीं, सरकार की भी आलोचना करने में पीछे नहीं हैं। 

पत्रकार सम्पादकीय तथा अग्रलेखों के माध्यम से किसी अहम् मुद्दे पर बहस छेड़ देते हैं। अपना अभिमत प्रदान करते हैं। इन सब के पीछे एक कुशल निरीक्षक परीक्षक जैसी दृष्टि और हाथ होता है जिस कारण हम पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ करार देते हैं।

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