What do you understand by press act and freedom of newspapers? | प्रेस अधिनियम और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं?

पत्रकारिता और कानून का सम्बन्ध (प्रेस अधिनियम और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता) आधारभूत सामाजिक समीकरण का साक्ष्य देता है। इससे पता चलता है कि किस देश में वाक् स्वतन्त्र्य कितना और कैसा है। संविधान में पत्रकारों की स्वतन्त्रता की अलग से कोई बात नहीं है। नागरिक की अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता और पत्रकारों की स्वतन्त्रता समान है। के.पी. नारायण के शब्दों में- “विधि किसी भी व्यक्ति का लिहाज नहीं करती और समाचार-पत्र कानून विधि से कदापि मुक्त नहीं है ।” 

समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता : 

शिकारी जैसे लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को संविधान में वाक् स्वतन्त्रता प्रदान की गई है वहां समाचार पत्रों का अलग उल्लेख नहीं है। अनुच्छेद 19 खण्ड ‘क’ में स्पष्ट लिखा है कि सब नागरिकों को अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य का अधिकार होगा अपने विचारों के प्रचार का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति का है। इन अर्थों में प्रत्येक नागरिक मौखिक या लिखित रूप में अपने विचारों का प्रचार कर सकता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि कुछ भी कहा या लिखा जा सकता है। अनुच्छेद के खण्ड ‘ख’ में लिखा है कि कोई बात जो अपमान लेख, अपमान वचन, मानहानि न्यायालय अवमान या शिष्टाचार पर आघात करें या राज्य की सुरक्षा को दुर्बल करे उस सम्बन्धी विधि राज्य के लिए कार्य करेगी। 

समाचार आयोग ने कहा कि पत्र भारी दबाव के अन्तर्गत कार्य कर रहे हैं और Slotแตกง่ายसमय से होड़ ले रहे हैं और उसका यही सुझाव है कि पत्रों द्वारा किए गए अपराधों के मामले में वैसी ही कार्यवाही न की जाये जैसी व्यक्तियों द्वारा किए अपराधों के मामलों में की जाती है। 

पत्रकार को हर कार्य सतर्कतापूर्वक करना चाहिए। विधि की सीमाओं में रहकर कार्य करना चाहिए । स्थूल रूप से इन विधियों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है

1. अपमान लेख तथा मानहानि

2. न्यायालय अवमानना 

3. विधान मण्डल अवमानना 

4. प्रैस कॉऊसिंल एक्ट 

5. नशीली दवाई तथा जादू उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 

6. भारतीय सरकारी रहस्य अधिनियम 

7. कृति स्वाम्य अधिनियम 

अपमान लेख व मानहानि : 

मानहानि, अपमान लेख, अपमान ऐसी बातें हैं जो पत्रकारों को आतंकित करती रहती हैं वह समाचार लिखते हुए, संवाद भेजते समय, समाचार का शीर्षक व इन्ट्रो बनाते समय, सम्पादक टिप्पणी लिखते समय इससे भयभीत रहता है। वास्तव में अभिव्यक्ति के विचार तो नहीं बल्कि भाषा का प्रयोग पत्रकार को मुसीबत में डाल देता है । शब्दों के अर्थ का सम्प्रेषण में सावधानी रखनी चाहिए। 

मानहानि मौखिक या लिखित रूप में मानहानि कथनों के संदर्भ प्रयुक्त होने वाला व्यापक शब्द है। अपमान लेख समाचार-पत्रों पर में प्रयुक्त होता है। इसके माध्यम से कोई आदमी घृणा, उपहास, अवहेलना का पात्र बन सकता है और उसकी ख्याति पर आघात पहुंचता है। अपमान लेख झूठे कथनों का प्रकाशन है जिससे किसी की अपकीर्ति होती है । मृत व्यक्ति के बारे में भी मानहानि का अपलेख नहीं किया जा सकता। अधिकांश मामलों में यदि सार्वजनिक हित में प्रकाशन आवश्यक हो तो कथनों की सत्यता का प्रमाण में निष्पक्ष टिप्पणी दी जाए। 

न्यायालय का अवमानना : 

न्यायालय के अवमान का खतरा सदा बना रहता है। पत्रों में प्रतिदिन Civil & Criminal सिविल दाण्डिक मामले के समाचार प्रकाशित होते हैं। उन पर सम्पादकीय टिप्पणियां भी प्रकाशित होती हैं यदि इस कार्य में सावधानी न रखी जाए तो यह सम्भावना है कि पत्रकार न्यायालय के अवमान का दोषी हो। न्यायमूर्ति नियोगी के अनुसार वास्तव में न्यायालय के अवमान की व्यापक और पूर्ण परिभाषा देन कठिन है और लगभग असम्भव है। अवमान की विधि के अधीन मुकद्दमेबाजी का पूरा क्षेत्र आ जाता है। 

जब कोई मामला न्यायालय के विचाराधीन हो तो उस मामले से सम्बन्धित लोगों के बारे में दुर्भावना उत्पन्न करना न्यायालय का अवमानना हो सकता है या फिर न्यायाधीश के चरित्र पर लांछन लगाना भी दण्डनीय है। न्यायालय की अवमानना के लिए सादी कैद छः महीने तथा जुर्माना के दण्ड का विधान है, परन्तु न्यायालय के समक्ष क्षमा याचना पर छूट भी दी जा सकती है। 

समाचार पत्र आयोग : 

भारतीय पत्र न्यायालयों की प्रतिष्ठा का ध्यान रखने के प्रति सजग रहे हैं जो कुछ अपराध हुए हैं वे अधिकतर न्यायालय अवमान विधि की जानकारी न होने के कारण हुए हैं। इस बारे में उचित सलाह यही है जो मामला न्यायाधीश हो उस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए । उचित टिप्पणी का अधिकार दिया गया है। 

तथ्यों और प्रयुक्त विधि परीक्षण किया जा सकता है। भले वे न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध विचार हो। पत्र कह सकता है कि निर्णय गलत है और मामले को देखते हुए दण्ड अधिक है, किन्तु न्यायालय की नीयत पर शक करना और यह कहना कि न्यायालय अक्षम है राजनीति प्रभावित है । 

विधानमण्डल का अवमानना : 

विधान मण्डल तथा संसदीय कार्यवाहियों में वाक् स्वातन्त्र्य होता है, परन्तु समाचार-पत्रों को विधानमण्डल के कथनों को प्रकाशित करने का विशेषाधिकार नहीं है। सार्वजनिक संवादों के लिए विधानमण्डल कोई अवरोध नहीं लगाते, किन्तु बहस का जानबूझकर भ्रामक विवरण का प्रकाशन दण्डनीय है। इस बारे में कोई लिखित उपबन्ध तो नहीं फिर भी संसद व विधान मण्डलों को विशेष अधिकार प्राप्त है।

 स्पष्ट यह कि समाचार-पत्रों को संसद में होने वाली कार्यवाही प्रकाशन का अधिकार प्राप्त नहीं है। संसद या विधान मण्डलों ने शक्तियों, विशेषाधिकारों को परिभाषित नहीं किया। संसद व विधानमण्डल के यह अधिकार हैं कि वह बहस के उन अंशों के प्रकाशन पर रोक लगा सकते हैं जिनमें विधानमण्डलों का अवमान हो सकता है। 

जब तक सही ढंग से कार्यवाही का प्रकाशन हो यह आदेश प्रवर्त्तन नहीं होता । संविधान के अनु. 105 व 194 में संसद व मण्डलों के कुछ विषय परिभाषित हुए हैं । इनमें वाक् स्वतन्त्रता की बात कही गयी है तथा विशेषाधिकार की चर्चा है कि समय-समय पर जैसा विधि द्वारा परिभाषित हो वैसे ही विशेषाधिकार होंगे। 

समाचार पत्र आयोग के अनुसार समाचार-पत्र विधानमण्डलों की प्रतिष्ठा और गौरव बढ़ाने के प्रति सजग रहते हैं। जहां तक पत्र वाक् स्वातन्त्र्य का उपयोग विधि द्वारा अनुज्ञात सीमाओं के भीतर करते हैं, सम्मान करना चाहिए और विशेषाधिकार भंग के रूप में अतिरिक्त निर्बन्धन तब तक नहीं लगाने चाहिएं जब तक कर्त्तव्यों के निर्वहण के लिए जानकारी न हो । 

प्रैस काऊंसिल एक्ट : 

इसका प्रमुख प्रयोजन है कि प्रैस काऊंसिल के माध्यम से प्रैस की स्वतन्त्रता की रक्षा की जाए तथा समाचार पत्रों का स्तर बना रहे। यह प्रैस की स्वतन्त्रता के कई मूलभूत आयामों के प्रस्तुत करने वाला अधिनियम है। प्रैस काऊंसिल एक व्यवस्था है जो प्रैस की स्वतन्त्रता के ठोस धरातल के लिए जनमत निर्माण करने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। कुछ ऐसी आन्तरिक स्थितियां होती हैं जिनमें प्रैस की स्वतन्त्रता पर आंच पहुंचती है उनकी जांच और निराकरण जरूरी है। 

प्रैस पर दबाव चाहे वह किसी भी रूप में और किसी भी दिशा से आये प्रैस काउंसिल के क्षेत्राधिकार में आता है। यदि सम्पादक के साथ अनुचित हस्ताक्षेप किया जाये तो प्रैस की स्वतन्त्रता को आघात पहुंचता है। प्रैस काऊंसिल का कर्त्तव्य हो जाता है कि वह ऐसे मामलों की जांच करे। सम्पादक प्रैस की स्वतन्त्रता का सजीव और सजग स्वर है। इसलिए उसकी स्वतन्त्रता की सुरक्षा प्रैस की स्वतन्त्रता की सुरक्षा है। 

दवाइयाँ व जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन अधिनियम) 

आपत्तिजनक, अश्लील विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु यह एक्ट बना। ऐसे सभी प्रकाशन जो सदाचार शिष्टाचार को आघात पहुंचाते हो जो जातियों, दलों या समूह में वैमनस्य लाते हों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। विज्ञापनों के लिए मुद्रक, प्रकाशक और सम्पादक की जिम्मेवारी रहती है। यदि विज्ञापन अवैध हों, आपत्तिजनक हो, अश्लील हो उन्हें प्रकाशित करने से युवा समाज को उत्तेजित किया जा सकता है। ऐसे प्रकाशन के लिए पत्रकार को दण्डित किया जा सकता है। 

1986 में विभिन्न विज्ञापनों में नारी अस्मिता के विरुद्ध अश्लीलता पर भी रोक लगायी गयी। ऐसा कोई भी विज्ञापन जिसमें नारीत्व को भहे तरीके से प्रस्तुत किया गया हो, विज्ञापनदाता को इस अधिनियम के खण्ड तीन के अनुसार दण्डित किया जा सकता है। 

कोई भी व्यक्ति ऐसा अश्लीत प्रकाशन नहीं करता और उसे प्रदर्शित भी नहीं कर सकता ऐसे कृत्य के विरुद्ध दण्ड का प्रावधान है। इसके लिए 2 वर्ष से 5 वर्षों तक का कारावास तथा जुर्माने का दण्ड रखा गया है। अंधविश्वास, जादू टोने आदि से उपचार के भ्रामक विज्ञापनों पर इस अधिनियम द्वारा रोक लगायी गयी है। 

भारतीय सरकारी रहस्य अधिनियम 1923 : 

इसके माध्यम से राज्य की सुरक्षा को हानि पहुंचाने वाली तथा राजद्रोह की प्रवृत्ति वाली अभिव्यक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है। इस अधिनियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राज्य के हितों और सुरक्षा के प्रतिकूल किसी भी प्रयोजन से किसी निषिद्ध स्थान या इसके समीप जाये या उसका निरीक्षण करे या उसका रहस्य प्राप्त करे, संग्रहण करे, लिपिबद्ध करे, प्रकाशित या प्रसारित करे तो उसे दण्डित किया जा सकता है। 

यह स्पष्ट निर्देश है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रकार की सूचना शत्रु को देना, सरकारी चित्रों, गोपनीय योजनाओं और संकेतों को आपत्तिजनक सरकारी रहस्यों की सूचना प्राप्त करना अपराध है। इस अधिनियम में विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत यह दण्डनीय अपराध है।

कृति स्वाम्य (Copy Right ) : 

इस अधिनियम में कुछ प्रावधान हैं जिनके माध्यम से साहित्य संगीत नाट्य, चित्र, चलचित्र एवं ग्रामोफोन रिकार्ड आदि के बारे में कृति के स्वामित्व की रक्षा का प्रयास रहता है। रचना, कृति बौद्धिक सम्पत्ति है। 1962 में फ्रेंक थेयर ने Legal control of the Press पुस्तक में यह स्पष्ट किया है। 

भारतवर्ष में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एकान्त के अधिकार की व्याख्या की है जबकि उस समय तक इंग्लैण्ड में यह व्याख्या नहीं थी। निजी एकान्त का अधिकार सम्पत्ति का अधिकार भी है यदि कोई व्यक्ति किसी की स्वीकृति के बिना उसका चित्र ले ले और प्रकाशित करे, उसके टैलीफोन को अनधिकार चेष्टा से सुनने का प्रयास करे तो यह निजी एकांत का अतिक्रमण है।

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