सम्पादन का उत्कृष्ट नमूना क्या होता है? | What is an excellent piece of editing?

सम्पादकीय पृष्ठ लगभग सभी समाचार-पत्रों में एक विशिष्ट माना जाने वाला पृष्ठ सम्पादकीय का होता है। कई पत्रों में प्रथम पृष्ठ का बायां कॉलम अथवा बीच का कोई पृष्ठ इस हेतु निर्धारित होता है। सम्पादकीय पृष्ठ पत्र का मुखारविंद और मस्तिष्क माना जाता है। सम्पादन का कर्म-कौशल सम्पादकीय पृष्ठ में झलकता है। यद्यपि पाठक वर्ग इसे अनदेखा कर देता है, कुछ शिक्षित व सूझबूझ रखने वाले पाठक ही इसका रसास्वादन करते हैं। यह बात ठीक है कि सम्पादकीय (Editing) पृष्ठ में सभी पाठकों की रुचि नहीं होती, क्योंकि हर पाठक की पसन्द की सामग्री उसमें नहीं होती। 

सम्पादकीय पृष्ठ

मूलतः सम्पादकीय पृष्ठ विचार पृष्ठ है जिसमें सम्पादक की अपनी विचारधारा को साकार रूप मिलता है। श्री के.पी. नारायण के अनुसार सम्पादकीय पृष्ठ में लेख इस तरह लिखे जाते हैं कि जनमत के निर्माताओं और उन लोगों को प्रभावित कर सकें जो कि नीति के सन्दर्भ में वास्तविक अर्थों में महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये ही नीति का निर्माण तथा कार्यान्वयन करते हैं। उनका जो आग्रह होता है वह प्रभावशील पाठको, समाज के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, जैसे- बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों और व्यावसायिकों, जैसे- डॉक्टरों, वकीलों और शिक्षकों तथा उन व्यक्तियों के प्रति होता है जो सामाजिक तथा नागरिक गतिविधियों में अग्रणी होते हैं। इस प्रकार प्रभावशील पाठकों का ध्यान आकर्षित कर सम्पादकीय पृष्ठ अपने पाठकों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों पर भी प्रभाव डालता है। 

सम्पादकीय पृष्ठ में सम्पादकीय तथा दो या तीन विशेष लेख होते हैं। ये सभी समाज की समस्याओं, ज्वलन्त विषयो, सामयिक संदर्भों पर आधारित होते हैं। सामाजिक जीवन का कोई भी पहल ऐसा नहीं जिस पर सम्पादकीय न लिखा जा सकता हो। इतना आवश्यक है कि सम्पादकीय पृष्ठ सुयोग्य, मेधावी, निष्णात, कर्म शिल्पकार सम्पादक की देन है।

उसका गरिमायुक्त व्यक्तित्व सम्पादकीय में भी झलकता है। सम्पादकीय सम्पादक की निर्वैयक्तिक (Impersonal) रचना तो होती है, परन्तु उसका शिल्प, भाव व विचार झलक पाता है। कभी गम्भीर विचारात्मक शैली अच्छी होती है तो कभी व्यंजनात्मक, व्यंग्यात्मक । ब्रिटिश काल में कई भारतीय पत्रकार व्यंग्यात्मक शैली में अच्छी रुचिकर, किन्तु विचार प्रसूत रचनाएं करते थे । विचार-वैविध्य लाने के लिए प्रबुद्ध एवं विषय मर्मज्ञ विद्वज्जन से भी लेख मंगाये जाते हैं।

सम्पादकीय पृष्ठ में पाठकों के पत्रों का अपना ही महत्त्व है। इन पत्रों को पाठकों द्वारा रचित सम्पादकीय भी कहा जाता है। पाठक अपने विचार अलग-अलग भाषा-शैली में भेजते हैं। इनमें विषयों की विविधता भी रहती है। सम्पादक पत्रों के ढेर में से प्रकाशन योग्य पत्र चुनता है। संक्षिप्त किन्तु रोचक समस्या पर आधारित पत्र भी रुचि लेकर पढ़े जाते हैं। सम्बन्धित पत्र पढ़कर उसकी अर्थवत्ता और प्रभाव को पहचान जाता है। यही एक ऐसा स्तम्भ है जिससे सम्पादक मण्डल के प्रभाव का पता चल जाता है। 

सम्पादकीय पृष्ठ पर हस्ताक्षरित स्तम्भ अर्थात् स्तम्भलेखक द्वारा लिखित सामग्री भी होती है जो सम्पादक मण्डल की नीति से भिन्न भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त कार्टून या अन्य रुचिकर सामग्री से पृष्ठ की एकरसता दूर करने का प्रयास भी होता है। इस तरह पृष्ठ को रुचिकर बनाया जा सकता है। यों तो सारा समाचार-पत्र सम्पादको की योग्यता, सूझबूझ और कलात्मक शैली पर निर्भर है।

हर पृष्ठ का सम्पादन भिन्न प्रकार से होता है, किन्तु सम्पादकीय पृष्ठ से ही समाचार-पत्र के महत्त्व का मूल्यांकन किया जा सकता है। अनुभवी, योग्य सम्पादक सम्पादकीय लेख के विषयों का चयन बड़ी जल्दी कर लेते हैं। सम्पादकीय पृष्ठ से सामयिक बोध, संक्षिप्तता, प्रभावोत्पादकता का पूरा आभास मिलता है। सुस्पष्ट और नीतियों का आभास देने वाले सम्पादकीय अच्छे माने जाते हैं। हर पृष्ठ का एक विन्यास है, हर सम्पादक अपने-अपने तरीके और रुचि के अनुरूप पत्र का स्वरूप बनाता है । हर पृष्ठ की सम्पादन शैली नूतनता से भरी है।

कभी विचारात्मक तो कभी विवरणात्मक, कभी वर्णनात्मक तो 

कभी परिहासपूर्ण शैली प्रयोग कर लेना चाहिए। इनके अतिरिक्त और भी शैलियां हैं जिनसे सम्पादकीय पृष्ठ ही नहीं बल्कि पत्र का हर पृष्ठ निखर उठता है और पाठक वर्ग को आकृष्ट करता है। 

रेडियो एवं दूरदर्शन के समाचार-सम्पादन सम्बन्धी सिद्धान्त

रेडियो और आधुनिक युग में अत्यन्त लोकप्रिय संचार माध्यम हैं। पर ये दोनों समाचार-पत्र और पत्रिका से पृथक हैं। रेडियो (श्रव्य) होने के कारण ध्वनि तथा दूरदर्शन (दृश्य-श्रव्य) होने के कारण ध्वनि-चित्र आधारित है। समाचार-पत्र के सम्पादन और इन दोनों के सम्पादन में अन्तर है। रेडियो सम्पादक को ऐसी भाषा-शैली चुननी पड़ती है जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके। दूरदर्शन में समाचार सम्पादन की ध्वनि के साथ-साथ चित्रों की भाषा का अभिज्ञान होना चाहिए। 

समाचार बुलेटिन प्रस्तुत करने से पूर्व समाचार कक्ष में सम्पादक उसे तैयार करते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि वाक्य संक्षिप्त एवं सरल हों। समाचार बोलने वाला लम्बे-लम्बे वाक्य नहीं बोल पाता फिर छोटे वाक्य श्रोताओं व द्रष्टाओं द्वारा आसानी से समझे जाते हैं। हर सूचना को सहज सरल रूप में व्यक्त करने पर बल देना चाहिए। अप्रचलित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सभी श्रोता व द्रष्टा साक्षर नहीं होते। 

कष्टसाध्य शब्दों के प्रयोग की अपेक्षा सरल एवं बोधगम्य वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए। नामोल्लेख करते समय संक्षेपाक्षर की अपेक्षा पूरे नाम का प्रयोग करें। समाचारों को अधिक रोचक बनाने के लिए समाचार दर्शन (न्यूजरील) रेडियो व दूरदर्शन में देने की परम्परा है। दूरदर्शन पर समाचार प्रस्तुति के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण समाचारों में आंखों देखा हाल, साक्षात्कार, घटनाओं के अंश, भेंटवार्ता आदि द्वारा रोचकता लायी जाती है । 

समाचार-पत्रों में तो छाया-चित्र व रूपक आदि से रोचकता उत्पन्न की जाती है। रेडियो समाचार बुलेटिन में एक ही व्यक्ति समाचार प्रस्तुत करता है और समाचार दर्शन में स्थल की रिकार्डिंग भी देता है।

 दूरदर्शन पर स्थल विशेष और व्यक्ति विशेष का सचल-चित्रांकन भी प्रस्तुत किया जाता है। समाचार बुलेटिन बनाते समय समाचार सम्पादक को हर समाचार के विषय में उसी तत्परता से सोचना पड़ता है जितना पत्र के समाचार सम्पादक को । समाचार के ताजापन समाचार- बोधगम्यता, समाचार चयन, समाचार शीर्षक, समाचार विस्तार आदि कुछ बिन्दु ऐसे हैं जो समाचार सम्पादक को ज्ञात होने चाहिए । रेडियो एवं दूरदर्शन प्रसारण के समय कुछ पल के लिए ही समाचार आते हैं उनकी प्रस्तुति इस प्रकार होनी चाहिए कि समाचार संयोजित लगे। 

महत्त्व के अनुरूप समाचारों को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। वास्तव में अच्छा समाचार बुलेटिन बनाना एक कला है। बुलेटिन की एक सीमित अवधि होती है इस सीमित अवधि में समाचारों को रुचिकर तरीके से प्रतिपादित करने की कला सम्पादक के कर्म कौशल और व्यक्तित्व की परिचायक है। कुशल एवं योग्य सम्पादक समाचार सम्पादन करते समय समाचार के औचित्य का ध्यान रखता है कि समाचार समयानुरूप है, उसमें नवीनता और तथ्यात्मकता, विवरणात्मक का संयोजन बना रहे। अभ्यास और चैतनयस्फूर्तता ऐसे उपादान हैं कि समाचार में सम्पादन करते समय अद्भुत कलात्मकता लायी जा सकती है। 

समाचार-पत्र तो लोग बार-बार भी पढ़ सकते हैं, परन्तु रेडियो और दूरदर्शन का प्रसारण एक ही बार होता है। रेडियो व दूरदर्शन की भाषा-शैली सजीव व सरल हो। रेडियो पर शब्दों द्वारा ही चित्रात्मकता आ पाये और दूरदर्शन पर प्रभावपूर्ण चित्र तथ्यानुरूप हो यह आवश्यक है । 

आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के समाचारेतर (अन्य ) सामग्री का सम्पादन : 

आधुनिक युग में आकाशवाणी और दूरदर्शन जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं। ये केवल समाचार देने का माध्यम नहीं हैं अपितु इन संचार माध्यमों से विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं जिनसे हर कोई मनोरंजन कर पाता है, ज्ञान अर्जित करता है। अमेरिका के विख्यात सम्पादकों की मान्यता है कि रेडियो और टेलीविजन ने महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण देने में चमत्कारपूर्ण कार्य किया है उन्होंने विश्व को एक दृश्य और श्रव्य मंच प्रदान किया है। एक ऐसा मंच जिससे सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक जैसे अनेक क्षेत्रों में विचारों का आदान-प्रदान होता है। उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कुछ चर्चाएं उत्कृष्ट और प्रोत्साहक होती है। 

रेडियो और दूरदर्शन पर समाचारेतर सामग्री में नाटक, कविता, झलकी, आंखों देखा हाल, रिपोर्ताज, जीवन के विविध विषय यथा स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, विज्ञान, धर्म, संस्कृति, समाज आदि पर चर्चा, परिचर्चाएं आती हैं। 

देश-विदेश, प्रादेशिक समाचारों के अतिरिक्त काफी सामग्री होती है जिससे श्रोता-द्रष्टा लाभान्वित हो सकते हैं। रेडियो और दूरदर्शन की विशिष्टता है कि ये दोनों सामूहिक माध्यम हैं। समाचार-पत्र तो एक ही व्यक्ति पढ़ सकता है, वह अपना पृष्ठ पढ़कर ही दूसरे को दे पाता है, किन्तु रेडियो और दूरदर्शन एक ही समय में काफी लोगों के लिए सेवा प्रस्तुत करते हैं। 

रेडियो : 

रेडियो के लिए प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री का सम्पादन अत्यन्त दुस्साध्य कर्म है। रेडियो के माइक्रोफोन पर वक्ता बोलता है जिसे मीलों दूर के श्रोता सुनते हैं। सम्पादक देखता है कि मूल कापी में वे सब विशेषताएं हैं जिससे रचना श्रव्यात्मक प्रभाव छोड़ सकती है। रेडियो में शाब्दिक व्यंजना का बड़ा महत्त्व है। शब्दों के अर्थ तो होते हैं, परन्तु शब्दों के व्यंजित होने वाले प्रारूप पर अर्थात् टोन आदि पर निर्भर करते हैं। 

रेडियो पर प्रस्तुत होने वाली हर रचना में ध्वनि तरंगों का सहारा लेना पड़ता है। समाचार-पत्र के लेखन से भिन्न रेडियो लेखन होता है। रेडियो स्क्रिप्ट को सम्पादक बड़ी सूक्ष्मता से पढ़ता है और उसे श्रव्य बनाने के लिए शब्द संयोजन में परिवर्तन भी ला देता है । यह उल्लेखनीय है कि रचना का सम्पादन करते समय भाषा की सहजता का ध्यान रखना जरूरी है। 

भाषा भाव और विचारों के अनुरूप होना चाहिए। चर्चा-परिचर्चा में ऐसा प्रतीत हो कि हम किसी से बात कर रहे हैं। चाहे कितना ही गम्भीर और बोझिल विषय हो यदि उसे भी सहज और सरल बनाने पर जोर दिया जाए तो रचना की लोकप्रियता और श्रोता की अभिरुचि बढ़ती है। 

रेडियो के लिए सम्पादन करते समय यह स्मरण रखना आवश्यक

है कि ध्वनि तरंगों से भी बिम्ब (Image) निर्माण होता है। रेडियो पर वक्ता के वाचन के उतार-चढ़ाव और संगीत की संगति से दृश्य योजन बनता है। श्रोता कार्यक्रम या रचना सुनता है और मानसपटल पर बिम्ब दृश्य- -विधान कर लेता है। रेडियो के लिए प्रस्तुत होने वाली सामग्री में ध्वनि से दृश्यात्मक विधान करने की क्षमता सम्पादक ही ला सकता है। 

सम्पादक को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि रेडियो एक प्रकार की प्रस्तुति होती है। समाचार पत्र के पृष्ठ तो पाठक फिर भी पढ़ सकता है, परन्तु रेडियो पर यह सुविधा सामान्यतः नहीं हो पाती। उसे रचनाकृत्ति का सम्पादन करते समय अनावश्यक विस्तार को हटाना चाहिए और वांछनीय सामग्री का नियोजन करना चाहिए। उसे यह स्मरण होना चाहिए कि एक बार प्रस्तुति होने के बाद गलती दूर नहीं की जा सकती। सम्पादक को पूरे तर्कसम्मत होकर प्रस्तुति को अपने विचारानुसार शब्द रूप देना चाहिए। 

रेडियो रचना सामग्री का सम्पादन करते समय यह भी जानना जरूरी है कि अमुक सामग्री किस वर्ग या समुदाय के लिए प्रस्तुत होनी है। वक्ता चाहे कितना भी प्रबुद्ध और विषय का ज्ञाता क्यों न हो, जब प्रस्तुति सामान्य मजदूर, किसान, निरक्षर अथवा महिला जगत के लिए हो, बालकों के लिए हो तो रचना को सरल, सहज बनाने में ही लाभ रहता है। 

रेडियो नाटक, रूपक, उपन्यास की प्रस्तुति करते समय सम्पादक को इस बात को भी अंगीकार करना होगा कि शब्दों द्वारा भाव संकेत (क्रोध, हास्य, शृंगार “वीभत्स, वेदना, करुणा) का सूत्रपात भी होना चाहिए। रेडियो सम्पादन की सफलता इन्हीं बातों पर आधारित है। इनके अभाव में रेडियो के लिए कार्यक्रम प्रभावात्मक नहीं हो पाते। 

रेडियो सम्पादक को ध्वनि तरंगो, संगीत, संवादीय-शैली की कला ज्ञान होना चाहिए। रेडियो सम्पादक को पता होना चाहिए कि संगीत द्वारा कार्यक्रम को कैसे अच्छा बनाया जा सकता है। जैसे नाटक के लिए प्रयुक्त स्वर लहरियां कहानी की भाव योजना से अलग होती हैं। उसे संगीत के अचूक और सक्षम प्रभाव की जानकारी हो तो अच्छा है।

रेडियो नाटक, धारावाहिक उपन्यास, आंखों देखा हाल, फीचर आदि रेडियो के प्रमुख आकर्षण हैं। रेडियो नाटक व उपन्यास के लेखन में सम्पादन करते समय यह जानना आवश्यक है कि रेडियो प्रस्तुति श्रव्य है, पाठ्य नहीं है। पात्र की पात्रता का लेखन में तो विस्तार प जाती है, परन्तु रेडियो पर प्रस्तुति करते समय ऐसा नहीं हो पाता, क्योंकि वहां समयाभाव रहता है। किसी पात्र की पात्रता का समग्ररूप प्रस्तुत करने के लिए संवाद और ध्वनि प्रयोगों का ही सहारा लेना होता है। 

यह एक कठिन कार्य है, परन्तु सम्पादक की सजग, सूक्ष्म, पैनी और अनुभवी दृष्टि से सब सम्भव है। संवाद योजना का सम्पादन करते समय यह आवश्यक है कि संवाद पात्रों, स्थितियों, कथा-वस्तु को व्यक्त करने वाले हों। स्थान, समय, कार्य में तालमेल भी जरूरी है। यद्यपि रेडियो नाटक व धारावाहिकों में सूत्रधार की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती परन्तु इसका भी प्रयोग नाटक को गति देने के लिए किया जा सकता है। 

रेडियो पर प्रस्तुत होने वाले फीचर, आंखो देखा हाल आदि अन्य कृतियां तो लेखक की निजी रचनाएं होती हैं इनकी समयावधि लगभग निश्चित होती है। फीचर तथा अन्य रचनाओं में तीज-त्योहार, मेला, दुर्घटना, ऐतिहासिक स्थान आदि विषय हुआ करते हैं। फीचर में तो जीवन के अधिकांश विषय ग्रहण किये जा सकते हैं। फीचर व अन्य रचनाओं में शिल्प का ध्यान रखना जरूरी है। इन कृतियों में भी शब्द द्वारा चित्र बनाने की परिकल्पना साकार करनी होती है। 

सम्पादक को इन विधाओं का पूरा ज्ञान होना चाहिए। इन रचनाओं की भाषा रोचक, प्रभावात्मक, मुहावरेदार हो तो बेहतर है। सम्पादक को यह ज्ञान होना चाहिए कि वह श्रोताओं के क्षेत्र का विस्तार लगभग कितना है और वह किस भाषा क्षेत्र में आता है। इसको भी ध्यान में रखना अत्यन्त आवश्यक है। 

दूरदर्शन : 

दूरदर्शन के आगमन ने संचार माध्यमों के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। देश के प्रत्येक हिस्से में दूरदर्शन के दर्शकों की भरमार है जो लोग अशिक्षित हैं (पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते) वे भी दूरदर्शन से मनोरंजन तथा ज्ञानार्जन करते हैं। रेडियो की भांति दूरदर्शन समाचारेतर काफी सामग्री प्रस्तुत करता है। 

चर्चा परिचर्चा, फीचर, नाटक, कहानी का नाट्यरूपांतर ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रम (शिक्षा, विज्ञान, गृह-विज्ञान, कृषि वानिकी तथा अन्य अनेक विषय) पर प्रसारित होते. हैं । समाचार सम्पादक के अतिरिक्त हर रचना के सम्पादक होते हैं जो रचना विशेष के तंत्र – विशेषज्ञ हैं और दृश्य विधान और ध्वनि (शब्द विधान) की दृष्टि से रचना को प्रस्तुति योग्य बनाते हैं।

रचना को किस • पृष्ठभूमि व वातावरण विशेष में प्रस्तुत करना है तथा उसमें कैसे परिवर्तन लाने हैं, इसका सम्पादक को ज्ञान होना चाहिए। उसे समयावधि के अनुरूप संक्षिप्त, सारगर्भित, रोचक तथा प्रभावात्मक प्रस्तुति बनाने के -लिए सम्पादन कार्य करना होता है। 

उसे उन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए जो रेडियो सम्पादक के लिए जरूरी है। उसका दायित्व चित्रांकन शैली होने के कारण और भी बढ़ जाता है उसे यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि किस रचना में कितने दृश्य विधान से काम चल जायेगा । उसे रचना के प्रसार को कलात्मक, सजीव बनाने के लिए पात्रानुरूप स्थानरूप छायांकन का भी ज्ञान होना चाहिए। यह अपने सम्पादनचातुर्य से ऐसी रचनाओं को जन्म दे सकता है जिनकी स्मृति द्रष्टाओं के मानसपटल पर अंकित हो जाये । 

सम्पादक का स्थान पत्रकारिता के क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट है, क्योंकि वह अपनी सूझ-बूझ और कर्म-कौशल से पत्रकारिता में रंग भरता है। रचनाओं को सरल, किन्तु आकर्षक बनाने की कला वही जानता है। सम्पादक समाज की सेवा भी करता है। वह केवल सूचनाएं प्रकाश में लाकर सन्तुष्ट नहीं हो जाता बल्कि समाज सेवा को अपना मिशन मानकर सूचनाओं के बारे में चर्चा, परिचर्चा भी करता है। आदर्श सम्पादक के लिए पत्रकारिता एक वृत्ति या व्यवसाय भर नहीं है वह समाज के भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य लाने में प्रयत्नशील रहता है। 

सुप्रसिद्ध पत्रकार कमलापति त्रिपाठी के शब्दों में- “यदि पत्रों का लक्ष्य केवल धन कमाना नहीं है यदि उनका आदर्श जनहित की रक्षा करना तथा साधारण मनुष्य का साथी, मित्र, उपदेष्टा तथा रक्षक होना है तो पथ-प्रदर्शक सम्पादक, सम्पादक होने के नाते, उन विशाल जनसमूह के प्रति उत्तरदायी है जिसकी सेवा करने के लिए उसका पत्र प्रकाशित होता है ।” 

अन्त में, यह कहा जा सकता है कि सम्पादन के आधारभूत सिद्धान्तों में यही माना जा सकता है कि सम्पादक को निष्पक्षता, विवेकशीलता, कर्त्तव्यपरायणता, युग-बोध का परिचय देना चाहिए। वह जिस रचना का सम्पादन व संकलन कर रहा है, उसे रचना की प्रक्रिया व विधागत सूक्ष्मताओं को अभिज्ञान होना चाहिए। उसे अपने संचार माध्यम को भी सुन्दर रूप प्रदान करने पर बल देना है। उसे सरल, सहज, बोधगम्य भाषा-शैली का प्रयोग करना चाहिए। 

सम्पादक को यह भी प्रयत्न करने पड़ते हैं जिससे रचना अत्यन्त सौष्ठवपूर्ण तरीके से प्रकाश में आ सके। संक्षेप में, सम्पादक का योगदान ही किसी पत्र या पत्रिका को प्रसिद्धि दिलाता है। इससे वह स्वयं भी प्रशस्ति का पात्र बन जाता । सम्पादन का आधार तो यही है कि सम्पादक को अपनी आत्मा, मन और मस्तिष्क रचना पद्धति में उड़ेल देना होगा तभी वह एक आदर्श सम्पादक बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

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